नीलेश रघुवंशी की कविता
जंगल और जड़
इमारत के ऊपर इमारत
खाई के नीचे खाई
दूर-दूर तक फैला कंक्रीट का जंगल
आएगा एक दिन ऐसा आएगा
जब हमें हमारी जमीन मिलेगी वापस
सीमेंट की टंकी में पानी पीती चिड़िया से
कहा पीपल की फूटती जड़ ने।
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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)
बहुत सुन्दर । कवित तक बधाई पहुँचे ।
Comment by अफ़लातून — February 13, 2007 @ 11:15 am
सुन्दर!
घुघूती बासूती
Comment by ghughutibasuti — February 13, 2007 @ 11:33 am
सीधी साधी सुंदर कविता !
Comment by अनुराग — February 13, 2007 @ 12:23 pm
वाह!
Comment by सुनील — February 13, 2007 @ 12:54 pm
समकालीन कविता!! अत्यंत सुंदर और खरा!!बधाई।
Comment by Divyabh — February 13, 2007 @ 8:00 pm
यह है ‘साइकिल’ पूरी होने की बात! हर एक का जीवन चक्र होता है! वाह!
Comment by अनूप शुक्ला — February 14, 2007 @ 2:00 am
great, lets hope this comes i our life span
Comment by nisha — February 15, 2007 @ 5:39 am
great, lets hope this comes in our life span
Comment by nisha — February 15, 2007 @ 5:42 am