Posted by: PRIYANKAR | मई 8, 2008

रजधानी की धज

देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

रजधानी की धज

 

भूपालों के नगर गए हम

हमने सुने   राग दरबारी ।

 

जाजम पर  हमको  बैठाया

सारा कर्ज़   माफ़ फ़रमाया

फिर वे लगे नाचने खुद ही —

अपनी छवि होते बलिहारी ।

 

देखे   सत्ता के   गलियारे

कागज के मुख  होते कारे

जन  तिनके-सा उड़ता दीखा

रजधानी की  धज ही न्यारी ।

 

******

 

( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 


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