Posted by: PRIYANKAR | जून 17, 2008

एक कम है

कुमार अम्बुज की एक कविता

 

एक कम है

 

अब एक कम है तो एक की आवाज कम है

एक का अस्तित्व एक का प्रकाश

एक का विरोध

एक का उठा हुआ हाथ कम है

उसके मौसमों के वसंत कम हैं

 

एक रंग के कम होने से

अधूरी रह जाती है एक तस्वीर

एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश

एक फूल के कम होने से फैलता है उजाड़ सपनों के बागीचे में

 

एक के कम होने से कई चीजों पर फ़र्क पड़ता है एक साथ

उसके होने से हो सकनेवाली हजार बातें

यकायक हो जाती हैं कम

और जो चीजें पहले से ही कम हों

हादसा है उनमें से एक का भी कम हो जाना

 

मैं इस एक के लिए

मैं इस एक के विश्वास से

लड़ता हूं हजारों से

खुश रह सकता हूं कठिन दुःखों के बीच भी

 

मैं इस एक की परवाह करता हूं ।

 

*******

 

 ( नंदकिशोर नवल और संजय शांडिल्य द्वारा संपादित कविताओं के संकलन ‘संधि-वेला’ से साभार )

 


Responses

  1. अच्‍छी कविताएं पढ़ा रहे हैं, प्रियंकर जी।
    एक की ताकत कम नहीं होती, एक से ही अनेक बनते हैं। समाज व्‍यक्ति से ही बनता है।

  2. bhut hi sundar rachana.likhate rhe.

  3. बहुत उम्दा रचना. आभार हम तक पहुंचाने का.

  4. अच्छी कविता….आप और कुमार जी दोनों को बधाई…

  5. साधुवाद इस बेहतरीन कविता को हम तक पहुँचाने के लिए.

  6. एक की परवाह तो होनी ही चाहिये। एक ही अनेक का मूल है। यह याद दिलाया – धन्यवाद।

  7. इस एक से ही सब कुछ है। एक न हो तो, दो, तीन, चार अनन्त कुछ भी नहीं। एक की परवाह करनी पडेगी।

  8. bahut khubsurat aashawadi kavita

  9. बेहतरीन रचना
    सही बात एक एक से ही समाज का निर्माण होता है


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: